अभिरक्षा में मृत्यु: जवाबदेही, संवैधानिक दायित्व और पारदर्शिता की कसौटी

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एड. अंशुल गौरव सिंह 

किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था की सबसे बड़ी परीक्षा यह होती है कि वह अपने सबसे कमजोर नागरिकों के साथ कैसा व्यवहार करती है। जब कोई व्यक्ति राज्य की अभिरक्षा में होता है, तब उसका जीवन और स्वास्थ्य पूरी तरह राज्य की जिम्मेदारी बन जाता है। हाल ही में केंद्रीय कारागार से उपचार हेतु रेफर किए गए एक बंदी की मृत्यु ने कई गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए हैं।

पूर्व शिकायतों के बावजूद नहीं मिल सका पर्याप्त उपचार

उपलब्ध अभिलेखों के अनुसार, बंदी की स्वास्थ्य स्थिति को लेकर पूर्व में संबंधित अधिकारियों को लिखित शिकायतें दी गई थीं। परिजनों ने गंभीर बीमारी, विशेषज्ञ उपचार की आवश्यकता और निजी अस्पताल में इलाज की अनुमति के लिए आवेदन भी किया था। यह भी बताया गया कि स्वास्थ्य लगातार गिर रहा था। बाद में उपचार के दौरान मेडिकल संस्थान में उनकी मृत्यु हो गई।

यह घटना केवल एक व्यक्तिगत त्रासदी नहीं है, बल्कि प्रशासनिक उत्तरदायित्व और संवैधानिक दायित्व का महत्वपूर्ण प्रश्न है।

संवैधानिक और कानूनी प्रावधान क्या कहते हैं

संवैधानिक दृष्टि से भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21 प्रत्येक व्यक्ति को जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार प्रदान करता है। सर्वोच्च न्यायालय ने अपने अनेक निर्णयों में स्पष्ट किया है कि यह अधिकार बंदी या दोषसिद्ध व्यक्ति से भी नहीं छीना जा सकता।

भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023 की धारा 176(1A) के अनुसार अभिरक्षा में मृत्यु की स्थिति में मजिस्ट्रियल जांच अनिवार्य है। इसके अतिरिक्त राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने भी ऐसे मामलों में विस्तृत दिशा-निर्देश निर्धारित किए हैं, जिनमें पोस्टमार्टम की वीडियोग्राफी, मेडिकल रिकॉर्ड का संरक्षण और स्वतंत्र जांच शामिल है।

जांच के प्रमुख प्रश्न

यदि पूर्व में बीमारी की सूचना दी गई थी, तो यह जांच का विषय है कि—

  • क्या समय पर विशेषज्ञ चिकित्सकीय परामर्श उपलब्ध कराया गया?
  • क्या रेफरल में अनावश्यक विलंब हुआ?
  • क्या जेल मैनुअल और स्वास्थ्य प्रोटोकॉल का पूर्ण पालन किया गया?

जवाबदेही और पारदर्शिता क्यों जरूरी

अभिरक्षा में मृत्यु का हर मामला राज्य की विश्वसनीयता से जुड़ा होता है। यह आवश्यक है कि जांच निष्पक्ष और पारदर्शी हो। जांच का उद्देश्य दोषारोपण नहीं, बल्कि तथ्य स्पष्ट करना और भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकना होना चाहिए।

यदि किसी स्तर पर लापरवाही पाई जाती है, तो उत्तरदायित्व तय होना चाहिए। वहीं, यदि सभी प्रक्रियाओं का पालन हुआ हो, तो उसे भी सार्वजनिक रूप से स्पष्ट किया जाना चाहिए। पारदर्शिता ही विश्वास का आधार है।

समयबद्ध जांच और सुधार की आवश्यकता

ऐसे मामलों में त्वरित और स्वतंत्र मजिस्ट्रियल जांच, सभी चिकित्सकीय और प्रशासनिक अभिलेखों का संरक्षण तथा जांच रिपोर्ट का समयबद्ध निष्पादन आवश्यक है। साथ ही, जेल स्वास्थ्य व्यवस्था की समय-समय पर स्वतंत्र समीक्षा भी की जानी चाहिए।

निष्कर्ष: विधि-राज की असली कसौटी

न्याय केवल न्यायालयों तक सीमित विषय नहीं है; यह प्रशासनिक संवेदनशीलता और उत्तरदायित्व का भी दर्पण है। अभिरक्षा में मृत्यु के प्रत्येक मामले को गंभीरता से लिया जाना चाहिए, क्योंकि यह केवल एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि विधि-राज (Rule of Law) की परीक्षा होती है।


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