पीलीभीत। ठंड बढ़ते ही पीलीभीत टाइगर रिजर्व (PTR) के बाघों और तेंदुओं की गतिविधि एक बार फिर जंगल सीमाओं से बाहर बढ़ने लगी है जिसके कारण मानव वन्यजीव संघर्ष की घटनाओ में इजाफा होने लगता हैँ। इस समय बराही रेंज से सटे गांव पत्ता बोझी, मुझाखुर्द, रघुनाथपुर और हरनाथपुर में लगातार बाघ देखे जा रहे हैं। हरीपुर रेंज से लगे इलाकों में एक तेंदुए की भी चहलकदमी दर्ज की गई है।सर्द मौसम में जंगल छोड़कर खेतों की ओर बढ़ते बाघों की यह प्रवृत्ति हर वर्ष सामने आती है।
पीलीभीत में बाघों की बढ़ती संख्या बनी मुख्य कारण
वन विभाग के आंकड़ों के अनुसार पीलीभीत टाइगर रिजर्व में इस समय करीब 70 के आस पास बाघ मौजूद हैं। बीते वर्षों में यह संख्या तेजी से बढ़ी है। विशेषज्ञों का मानना है कि बाघों की जनसंख्या बढ़ने से वन क्षेत्र छोटा पड़ने लगा है।जंगल का क्षेत्र बढ़ते बाघ के अनुसार पर्याप्त नहीं है।इन दोनों कारणों से कई बाघ नए आवास और भोजन की तलाश में रिहायशी इलाकों की ओर रुख करने लगे हैं।
गन्ने के खेत बाघों के लिए क्यों बनते हैं ठिकाने?

ठंड के दिनों में जंगल के आसपास खड़ी गन्ने की फसल बाघों के लिए सबसे सुरक्षित और अनुकूल आश्रय बन जाती है। गन्ने का खेत दिखने में नरकुल (रीड ग्रास) जैसा लगता है, जिसमें बाघ स्वाभाविक रूप से रहना पसंद करते हैं।गन्ने की घनी फसल में बाघ आसानी से छिप सकते हैं।दिन के समय ठंड से बचाव मिलता है। शिकार की भरपूर उपलब्धता रहती है।नीलगाय, चीतल, सांभर और जंगली सूअर अक्सर इन्हीं खेतों में घूमते पाए जाते हैं।इन्हीं कारणों से गन्ने की फसल सर्दियों में बड़े पैमाने पर बाघों और तेंदुओं की पसंदीदा शरणस्थली बन जाती है।
किसानों को वैकल्पिक फसलें बोने की सलाह, पर नहीं हुआ पालन
बीते वर्षों में बढ़ते मानव–वन्यजीव संघर्ष को देखते हुए प्रशासन ने कई बार सलाह दी कि जंगल सीमा से लगे गांवों में गन्ने के स्थान पर मेंथा, दलहनी या अन्य कम घनी फसलें लगाई जाएँ, जिससे बाघ खेतों की ओर न आ सके।कई गांवों में अधिकारियों ने बैठकों का आयोजन भी किया, लेकिन किसानों को उनमे आर्थिक लाभ कम नजर आया। तकनीकी मदद और सब्सिडी समय पर भी नहीं मिल सकी वही योजनाएँ केवल कागजों पर ही सीमित रहीं।नतीजतन ग्रामीणों ने बड़े पैमाने पर फसल चक्र में बदलाव नहीं किया। इस कारण संघर्ष की समस्या वैसी बनी हुई है।
जंगल छोड़ रिहायशी क्षेत्रों की ओर बढ़ते बाघ
पीलीभीत टाइगर रिजर्व से बाहर आ रहे बाघ अब कई बार खेतों में घूमते ,गांव की पगडंडियों पर चलते,मवेशियों पर हमला करते रात के समय घरों के पास दिखाई देते पाए जा रहे हैं। इससे ग्रामीणों में दहशत का माहौल है। किसान रातभर पहरा देते नजर अ रहे है।
सरकार और विभाग की योजनाएँ धरातल पर कमजोर
पिछले वर्ष जब संघर्ष की घटनाएं बढ़ीं, तब मुख्यमंत्री के निर्देश पर वन मंत्री डॉ. अरुण सक्सेना स्वयं पीलीभीत आए थे। बैठक में जंगल सीमा पर निगरानी ,संवेदनशील गांवों में जागरूकता फसल चक्र परिवर्तन,सुरक्षा उपायों में वृद्धि जैसी योजनाएँ बनीं, लेकिन अधिकांश पहल कागजों से आगे नहीं बढ़ सकीं। नतीजन बाघों का मूवमेंट लगातार बढ़ रहा है और संघर्ष की घटनाएँ भी तेजी से सामने आ रही हैं।
वन विभाग का दावा—ड्रोन और हाथियों से निगरानी बढ़ाई
मनीष सिंह, डिप्टी डायरेक्टर, पीटीआर के अनुसार—
“मानव–वन्यजीव संघर्ष रोकने के लिए विभाग पूरी तरह सतर्क है। जंगल सीमाओं पर गश्त बढ़ाई गई है। जरूरत पड़ने पर थर्मल ड्रोन और गश्ती हाथियों की मदद ली जा रही है। ‘बाघ एक्सप्रेस’ के जरिए संवेदनशील गांवों में ग्रामीणों को जागरूक भी किया गया है।”

