पीलीभीत: नगर पालिका परिषद पीलीभीत में वित्तीय अनियमितताओं को लेकर अधिवक्ता अंशुल गौरव सिंह द्वारा दायर सूचना का अधिकार (RTI) आवेदन को 40 दिनों से अधिक समय बीत जाने के बाद भी जवाब नहीं देना नगर पालिका की कार्यशैली को कटघरे में खड़ा कर रहा है। RTI कानून के अनुसार मांगी गई सूचना 30 दिनों के भीतर उपलब्ध कराना अनिवार्य है, लेकिन लोक सूचना अधिकारी (PIO) की चुप्पी कई सवाल खड़े कर रही है कि आखिर नगर पालिका किस जानकारी को छिपाने का प्रयास कर रही है।
RTI में मांगी गई थी वित्तीय वर्ष 2024-25 की पूरी जानकारी
4 अक्टूबर 2025 को दायर किए गए RTI आवेदन में अधिवक्ता अंशुल गौरव सिंह ने नगर पालिका के वित्तीय वर्ष 2024-25 के संपूर्ण बजट, खर्च, भुगतान और सभी बिलों की प्रमाणित प्रतियां मांगी थीं। आवेदन में साफ तौर पर उल्लेख किया गया था कि—
* संपूर्ण बजट का लेखा-जोखा
* आय-व्यय से जुड़े सभी रिकॉर्ड
* किए गए सभी भुगतान के बिल
* और वित्तीय लेनदेन से जुड़े अन्य दस्तावेज
RTI एक्ट की धारा 6(1) के तहत मांगी गई सूचना पर जवाब देना कानूनन आवश्यक है। इसके बावजूद 30 दिन की निर्धारित अवधि में तो दूर, 40 दिनों बाद भी कोई सूचना उपलब्ध नहीं कराई गई। विशेषज्ञों का कहना है कि सूचना न देना अपने आप में एक गंभीर प्रशासनिक चूक है और यह पारदर्शिता से जुड़े सवालों को और मजबूत करता है।
PIO की चुप्पी ने बढ़ाया गड़बड़ी का शक
नगर पालिका द्वारा सूचना देने में हिचकिचाहट यह संकेत देती है कि कहीं न कहीं रिकॉर्ड में अनियमितताएँ हो सकती हैं। RTI कार्यकर्ताओं का मानना है कि जब किसी विभाग के पास छिपाने के लिए कुछ नहीं होता, वह बिना देर किए सूचना उपलब्ध कराता है। लेकिन जनधन से जुड़े महत्त्वपूर्ण दस्तावेजों को छिपाना कई संभावित अनियमितताओं की तरफ इशारा करता है।
अधिवक्ता ने दायर की प्रथम अपील, अब कार्रवाई की उम्मीद
PIO द्वारा चुप्पी साधे जाने के बाद अधिवक्ता अंशुल गौरव सिंह ने RTI एक्ट की धारा 19 के तहत प्रथम अपील दायर कर दी है। अपील में स्पष्ट लिखा गया है कि PIO का यह रवैया न केवल RTI कानून का उल्लंघन है, बल्कि भ्रष्टाचार को छिपाने का गंभीर प्रयास भी है। अपील अधिकारी के पास अब कानूनन 30 दिन का समय है, जिसमें उसे यह तय करना होगा कि मांगी गई सूचना उपलब्ध क्यों नहीं कराई गई।कानून के अनुसार यदि प्रथम अपील के बाद भी सूचना नहीं दी गई, तो PIO पर प्रतिदिन 250 रुपये के हिसाब से अधिकतम 25,000 रुपये तक का जुर्माना लगाया जा सकता है। साथ ही विभागीय कार्रवाई भी संभव है।
मामला जा सकता है दूसरी अपील या कोर्ट तक
अधिवक्ता अंशुल गौरव सिंह का कहना है कि यदि प्रथम अपील में भी संतोषजनक उत्तर नहीं मिलता है, तो दूसरी अपील राज्य सूचना आयोग के समक्ष की जा सकती है। कई मामलों में आयोग दोषी अधिकारियों पर कड़ी कार्रवाई और भारी जुर्माना लगाने के लिए जाना जाता है। आवश्यकता पड़ने पर यह मामला न्यायालय तक भी पहुंच सकता है।

