पीलीभीत। स्वशासी राजकीय मेडिकल कॉलेज में आउटसोर्स कर्मियों को दो माह से मानदेय न मिलने का मामला शुक्रवार को अचानक धरना-प्रदर्शन तक पहुंच गया। नई बिल्डिंग में बड़ी संख्या में आउटसोर्स कर्मियों ने काम रोककर धरना शुरू कर दिया। करीब एक घंटे तक चली इस स्थिति से अस्पताल की व्यवस्थाएं प्रभावित हुईं और दूर-दराज से इलाज कराने पहुंचे मरीजों तथा तीमारदारों को परेशानी का सामना करना पड़ा। एक तरफ कर्मी अपने लंबित मानदेय को लेकर परेशान हैं, तो दूसरी तरफ संवेदनशील अस्पताल में काम रोककर धरना देने के औचित्य पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं।
तीन दिन पहले दिया था प्रार्थना पत्र
आउटसोर्स कर्मियों का कहना है कि उन्हें लगातार दो माह से मानदेय नहीं मिला है। आर्थिक तंगी से परेशान कर्मियों ने करीब तीन दिन पहले मेडिकल कॉलेज के प्राचार्य डॉ. अमित कुमार को प्रार्थना पत्र देकर भुगतान कराने की मांग की थी। इसी मामले में स्वास्थ्य से जुड़े संगठन की ओर से मुख्यमंत्री और जिलाधिकारी को संबोधित ज्ञापन भी सौंपा गया था। इसके बाद जल्द मानदेय दिलाने का आश्वासन दिए जाने की बात सामने आई थी। इसके बावजूद शुक्रवार को कर्मचारियों ने अचानक कार्य से विरत होकर धरना शुरू कर दिया।
करीब 11 बजे अचानक शुरू हुआ प्रदर्शन
शुक्रवार को करीब 11 बजे बड़ी संख्या में आउटसोर्स कर्मचारी मेडिकल कॉलेज की नई बिल्डिंग में एकत्र हुए और काम बंद कर धरने पर बैठ गए। कर्मचारियों ने दो माह से मानदेय न मिलने का मुद्दा उठाया। उनका कहना था कि नियमित रूप से सेवाएं देने के बावजूद समय से भुगतान नहीं किया जा रहा है। लंबे समय से भुगतान अटका होने के कारण परिवार का खर्च चलाना मुश्किल हो रहा है।
पर्चा और उपचार के लिए पहुंचे मरीज परेशान
धरने का सीधा असर अस्पताल आने वाले मरीजों पर पड़ा। एक तरफ भारी बरसात की मार और दूसरी तरफ कर्मियों का धरना, दो तरफ़ा मार से दूर दराज से आये मरीजों को भोगना पड़ा।पर्चा बनवाने से लेकर उपचार तक के लिए दूर-दराज से आए मरीजों को इंतजार करना पड़ा। इसी बीच तेज बारिश ने भी परेशानी बढ़ा दी। कई मरीज और तीमारदार बारिश से बचने के लिए इधर-उधर जगह तलाशते नजर आए। मरीजों का कहना था कि कर्मचारियों की मानदेय संबंधी समस्या जायज है, लेकिन अस्पताल में सेवाएं बाधित होने से सबसे अधिक परेशानी उन लोगों को होती है जो पहले से बीमारी और आर्थिक मजबूरी से जूझते हुए इलाज के लिए यहां पहुंचते हैं।
प्राचार्य पहुंचे तो सामने रखी समस्याएं
धरने की जानकारी मिलते ही मेडिकल कॉलेज के प्राचार्य डॉ. अमित कुमार मौके पर पहुंचे। उन्होंने कर्मचारियों से बातचीत कर उनकी समस्याएं सुनीं। कर्मचारियों ने संबंधित कंपनी की कार्यप्रणाली को लेकर भी शिकायतें रखीं। प्राचार्य ने कर्मचारियों को आश्वासन दिया कि रक्षाबंधन से पहले मानदेय दिलाने का प्रयास किया जाएगा।लेकिन धरना सही नहीं है मांग की जा सकती है लेकिन स्वास्थ्य व्यवस्था पर प्रभाव नहीं पड़ना चाहिए।
आखिर संवेदनशील अस्पताल में धरना कितना उचित?
मानदेय न मिलना कर्मचारियों के लिए गंभीर आर्थिक समस्या है और इसका समाधान कराया जाना जरूरी है। लेकिन सवाल यह है कि जहां हर दिन बड़ी संख्या में मरीज इलाज की उम्मीद लेकर पहुंचते हैं, वहां अचानक काम रोककर धरना देना कितना उचित है? खासकर तब, जब कर्मचारियों की ओर से कुछ दिन पहले ही प्रार्थना पत्र और ज्ञापन के माध्यम से अपनी समस्या अधिकारियों तक पहुंचाई जा चुकी थी।
मरीजों और तीमारदारों का कहना है कि अस्पताल में आने वाला व्यक्ति अपनी बीमारी और परेशानी से पहले ही जूझ रहा होता है। ऐसे में अस्पताल की सेवाएं प्रभावित होने पर उसकी मुश्किल कई गुना बढ़ जाती है। इसलिए कर्मचारियों की समस्या का समाधान भी जरूरी है और मरीजों की सेवाएं निर्बाध रखना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
धरने के पीछे ‘अंदरखाने’ की भूमिका की चर्चा
धरने के दौरान यह भी चर्चा रही कि कुछ लोगों ने धरने पर बैठे कर्मचारियों को कंपनी के खिलाफ नारेबाजी के लिए उकसाया। हलाकि नारेबाजी नहीं हुई लेकिन कोशिश पूरी की गई।सूत्रों के अनुसार, धरने को लेकर अस्पताल के ही कुछ कर्मचारियों की भूमिका होने की चर्चा है। यह भी बताया जा रहा है कि प्राचार्य के मौके से चले जाने के बाद धरने को सफल बनाने को लेकर कुछ लोगों ने एक-दूसरे की पीठ थपथपाई।
यदि इन आरोपों में सच्चाई है तो यह गंभीर विषय है। अस्पताल जैसे संवेदनशील संस्थान के भीतर कर्मचारियों के बीच असंतोष को हवा देकर मरीजों की सेवाएं प्रभावित करना किसी भी स्थिति में उचित नहीं माना जा सकता। हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र जांच के बाद ही स्थिति स्पष्ट हो सकेगी।
कर्मचारियों का भुगतान हो, लेकिन मरीजों की कीमत पर नहीं
दो माह से मानदेय न मिलना आउटसोर्स कर्मियों के लिए निश्चित रूप से चिंता का विषय है। समय से भुगतान होना उनकी मेहनत का अधिकार है और संबंधित एजेंसी तथा अस्पताल प्रशासन को इस समस्या का स्थायी समाधान निकालना चाहिए। लेकिन इसके साथ ही यह भी सुनिश्चित किया जाना जरूरी है कि कर्मचारियों के विवाद का असर मरीजों के उपचार और अस्पताल की जरूरी सेवाओं पर न पड़े।

