विश्व आत्महत्या रोकथाम दिवस -ब्रेकअप से परीक्षा के दबाव तक दिखाई मानसिक परेशानी

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रिंटू वर्मा…

पीलीभीत। जिंदगी की मुश्किल परिस्थितियां जब मानसिक दबाव का रूप ले लेती हैं तो व्यक्ति खुद को अकेला महसूस करने लगता है। ऐसे समय में संवेदनशील संवाद, परिवार का साथ और समय पर विशेषज्ञ की मदद किसी की जिंदगी बचाने में अहम भूमिका निभा सकती है। विश्व आत्महत्या रोकथाम दिवस पर स्वशासी राज्य चिकित्सा महाविद्यालय एवं संबद्ध चिकित्सालय के मानसिक रोग विभाग ने साइको ड्रामा के जरिए मानसिक संकट की चार अलग-अलग परिस्थितियों को जीवंत कर आत्महत्या रोकथाम का प्रभावी संदेश दिया।

 

ब्रेकअप से परीक्षा के दबाव तक दिखाई मानसिक परेशानी

साइको ड्रामा में प्रेम संबंध में असफलता और ब्रेकअप के बाद उत्पन्न मानसिक संकट, शराब की लत, समलैंगिकता से जुड़े सामाजिक एवं मानसिक तनाव तथा प्रतियोगी परीक्षाओं में बेहतर प्रदर्शन के दबाव को प्रभावी ढंग से प्रस्तुत किया गया। इंटर्न चिकित्सकों ने विभिन्न भूमिकाओं में अभिनय कर यह दिखाया कि मानसिक संकट से गुजर रहे व्यक्ति के व्यवहार में होने वाले बदलावों को समय रहते पहचानना कितना जरूरी है।

‘बात खुलकर कहने दें, दोष नहीं सहयोग दें’

प्रधानाचार्य डॉ. अमित कुमार ने कहा कि मानसिक तनाव या आत्महत्या के विचारों से जूझ रहे व्यक्ति को अपनी बात खुलकर रखने के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। परिवार के लोगों को उसकी बात धैर्य और संवेदनशीलता से सुननी चाहिए। ऐसे व्यक्ति को दोष देने या उसकी समस्या को नजरअंदाज करने के बजाय भावनात्मक सहयोग और समय पर विशेषज्ञ की मदद उपलब्ध कराना जरूरी है। विद्यार्थियों और युवाओं में परीक्षा तथा जीवन से जुड़े तनाव को समझकर उन्हें उचित परामर्श और सहयोग देना बेहद आवश्यक है।

अकेलेपन से बाहर आने का दिया संदेश

मुख्य चिकित्सा अधीक्षक डॉ. एसपी सिंह ने अपने शायराना अंदाज में लोगों को अकेलेपन से बाहर आने और एक-दूसरे से संवाद बनाए रखने का संदेश दिया। उन्होंने कहा कि किसी व्यक्ति को अकेला महसूस न होने देना, उसकी बात सुनना और उसके साथ समय बिताना मानसिक स्वास्थ्य की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। परिवार और समाज को मानसिक परेशानी से गुजर रहे लोगों के प्रति संवेदनशील रवैया अपनाना चाहिए।

चेतावनी संकेतों को समय रहते पहचानना जरूरी

उप प्रधानाचार्य डॉ. अरुण सिंह ने कहा कि आत्महत्या के विचारों को छिपाने या नजरअंदाज करने के बजाय उनके बारे में खुलकर बात करना जरूरी है। परिवार, शिक्षक, मित्र और स्वास्थ्यकर्मी यदि समय रहते चेतावनी संकेतों को पहचानकर व्यक्ति को उचित सहायता से जोड़ें तो कई जिंदगियों को बचाया जा सकता है। ऐसे कार्यक्रम मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े सामाजिक कलंक को कम करने में भी मददगार हैं।

मानसिक संकट को छोटा समझना पड़ सकता है भारी

मानसिक रोग विभागाध्यक्ष डॉ. प्रियंका भटनागर ने कहा कि आत्महत्या का विचार अक्सर गंभीर मानसिक और भावनात्मक संकट का संकेत होता है। ऐसे व्यक्ति को अकेला छोड़ने या उसकी परेशानी को छोटा समझने के बजाय उसकी बात ध्यान से सुनना और बिना किसी पूर्वाग्रह के सहायता देना जरूरी है। समय पर मनोचिकित्सकीय परामर्श और उपचार से आत्महत्या के जोखिम को कम किया जा सकता है। विभाग का उद्देश्य मानसिक स्वास्थ्य को लेकर झिझक और कलंक को कम करना तथा लोगों को समय पर सहायता लेने के लिए प्रेरित करना है।

इंटर्न चिकित्सकों ने निभाए अलग-अलग किरदार

साइको ड्रामा में इंटर्न चिकित्सकों ने प्रभावी अभिनय किया। डॉ. प्रणव सिंह ने तांत्रिक, डॉ. भूपेश ने चिकित्सक, डॉ. काव्या गंगवार ने मनोवैज्ञानिक, डॉ. इति वर्मा ने पढ़ाई के दबाव से जूझ रही छात्रा, डॉ. तौफीक अंसारी ने पिता, डॉ. भर आलम ने समलैंगिक व्यक्ति, डॉ. मरियम जहरा ने उनकी बहन, डॉ. आशुतोष चौहान ने ब्रेकअप से प्रभावित युवक, डॉ. आकृति वर्मा ने युवती, डॉ. वासी ने फर्जी चिकित्सक तथा डॉ. शिवांशु सिंह ने शराब की लत से प्रभावित मित्र की भूमिका निभाई।

चिकित्सक, स्वास्थ्यकर्मी और आमजन रहे मौजूद

कार्यक्रम में प्राचार्य डॉ. अमित कुमार, मुख्य चिकित्सा अधीक्षक डॉ. एसपी सिंह, उप प्रधानाचार्य डॉ. अरुण सिंह, एसोसिएट प्रोफेसर कम्युनिटी मेडिसिन डॉ. हुमा खान, मानसिक रोग विभागाध्यक्ष डॉ. प्रियंका भटनागर, जूनियर रेजिडेंट डॉ. रविंद्र गंगवार सहित चिकित्सक, इंटर्न चिकित्सक, स्टाफ नर्स, कर्मचारी, स्वास्थ्यकर्मी और आमजन मौजूद रहे।

 


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