(रिंटू वर्मा)
पीलीभीत। स्वशासी राजकीय चिकित्सा महाविद्यालय एवं संबद्ध जिला चिकित्सालय, पीलीभीत की इंटेंसिव केयर यूनिट (आईसीयू) ने चिकित्सा क्षेत्र में उल्लेखनीय उपलब्धि हासिल करते हुए 30 वर्षीय युवक की जान बचाई है। युवक स्टेज–4 ट्यूबरकुलस मेनिन्जाइटिस (ब्रेन टीबी) से पीड़ित होकर गहरे कोमा की अवस्था में अस्पताल लाया गया था। यह सफलता जहां जिले की आईसीयू क्षमताओं का प्रमाण है, वहीं टीबी की दवा बीच में छोड़ने के घातक परिणामों की चेतावनी भी देती है।
इलाज अधूरा छोड़ने की भारी कीमत
मरीज को अगस्त 2025 में डिसेमिनेटेड टीबी का निदान हो चुका था, लेकिन कुछ समय दवा लेने के बाद उसने उपचार बीच में ही छोड़ दिया। इससे टीबी के जीवाणु और अधिक आक्रामक हो गए तथा मस्तिष्क, फेफड़ों और किडनी को एक साथ प्रभावित कर दिया। हालत बिगड़ने पर मरीज को कोमा, शरीर में लकवा और गंभीर किडनी फेल्योर की स्थिति में आईसीयू में भर्ती कराया गया।
स्टेज–4 ब्रेन टीबी में कम होती है बचने की संभावना
चिकित्सकों के अनुसार स्टेज–4 ट्यूबरकुलस मेनिन्जाइटिस में मृत्यु दर अत्यंत अधिक होती है। दवा अधूरी छोड़ने के कारण मरीज में हाइड्रोसेफेलस विकसित हो गया, जिससे मस्तिष्क में सूजन आ गई और वह पूरी तरह अचेत हो गया। इस अवस्था से मरीज का सुरक्षित बाहर आना जिले के लिए बड़ी चिकित्सकीय उपलब्धि माना जा रहा है।
आईसीयू में पहली बार बेडसाइड पीसीएन
मरीज के कोमा में होने और पीयूजे ऑब्स्ट्रक्शन के कारण किडनी फेल होने की स्थिति को देखते हुए आईसीयू में ही बेडसाइड पर परक्यूटेनियस नेफ्रोस्टॉमी (पीसीएन) की गई। यह जिले में पहली बार किया गया जीवनरक्षक हस्तक्षेप रहा। किडनी में ड्रेनेज ट्यूब डालने के बाद गुर्दों की कार्यक्षमता सुधरी, जिससे मस्तिष्क की सूजन का उपचार संभव हो सका। इसके बाद मरीज को होश आया और वह परिजनों से बातचीत करने लगा।
लगातार दूसरी बड़ी सफलता
पिछले माह भी 14 वर्षीय बालिका को गंभीर डिसेमिनेटेड टीबी की अवस्था में आईसीयू में भर्ती किया गया था, जिसमें मस्तिष्क, फेफड़ों और पेट में संक्रमण की पुष्टि हुई थी। आईसीयू टीम के समन्वित प्रयासों से उस बच्ची की हालत भी स्थिर कर जीवनदान दिया गया। इससे स्पष्ट है कि पीलीभीत मेडिकल कॉलेज की आईसीयू अब जटिल टीबी मामलों के लिए भरोसेमंद केंद्र बनती जा रही है।
डॉक्टरों की अपील—दवा पूरी करें, जीवन सुरक्षित रखें
आईसीयू प्रभारी डॉ. अरविंद एम ने बताया कि टीबी पूरी तरह ठीक होने वाली बीमारी है, बशर्ते दवाओं का पूरा कोर्स लिया जाए। उन्होंने लोगों से अपील की कि बेहतर महसूस होने पर भी दवा बीच में न छोड़ें तथा किसी भी दुष्प्रभाव की स्थिति में तुरंत चिकित्सक से संपर्क करें।
प्राचार्य ने टीम को दी बधाई
मेडिकल कॉलेज की प्राचार्य डॉ. संगीता अनेजा ने इस उपलब्धि पर आईसीयू टीम को बधाई देते हुए कहा कि कोमा में भर्ती मरीज को स्टेज–4 डिसेमिनेटेड टीबी जैसी जानलेवा बीमारी से सुरक्षित निकालना संस्थान की उन्नत चिकित्सा क्षमता और समर्पित स्टाफ का प्रमाण है। उन्होंने कहा कि बेडसाइड पीसीएन जैसे जटिल हस्तक्षेप यह दर्शाते हैं कि मेडिकल कॉलेज अब अत्यंत चुनौतीपूर्ण मामलों के उपचार में भी पूरी तरह सक्षम है।

