रिंटू वर्मा…
पीलीभीत। स्वशासी राज्य चिकित्सा महाविद्यालय एवं संबद्ध चिकित्सालय, पीलीभीत में चिकित्सकों और नर्सिंग स्टाफ ने समर्पण, संवेदनशीलता और विशेषज्ञता का परिचय देते हुए एक 35 वर्षीय दिव्यांग पुरुष रोगी का सफल उपचार कर मानवता की मिसाल पेश की है। यह मामला इस बात का सशक्त उदाहरण बनकर सामने आया है कि चिकित्सा केवल दवाओं तक सीमित नहीं, बल्कि रोगी की गरिमा, पुनर्वास और सामाजिक सशक्तिकरण से भी जुड़ी होती है।
रोगी को आपातकालीन विभाग में अत्यंत गंभीर अवस्था में लाया गया था। वह सांस लेने में असमर्थ हो रहा था और पूर्व से ही निचले शरीर के पक्षाघात (पैराप्लेजिया) से पीड़ित था, जो पॉट्स स्पाइन (रीढ़ की हड्डी का क्षय रोग) और बचपन में हुए पोलियो के कारण हुआ था।
जांच में सामने आईं कई जानलेवा चिकित्सीय स्थितियां
आईसीयू में भर्ती कर तत्काल उपचार शुरू किया गया। जांच के दौरान कई गंभीर स्थितियां सामने आईं—
- गंभीर हाइपोग्लाइसीमिया: रक्त शर्करा केवल 24 mg/dL, जिससे रोगी बेहोशी की स्थिति में पहुंच गया था।
- गंभीर एनीमिया: हीमोग्लोबिन स्तर मात्र 5.8 g/dL।
- हाइपोनेट्रेमिया: सोडियम स्तर 122 mmol/L।
- हाइपोप्रोटीनीमिया: एल्ब्यूमिन स्तर 1.74 g/dL, जो गंभीर कुपोषण का संकेत था।
- सेप्सिस: कुल श्वेत रक्त कणिका संख्या 26,500, जो गंभीर संक्रमण का प्रमाण था।
- गंभीर बेडसोर: पीठ, नितंब और अंडकोष क्षेत्र में कई ग्रेड-4 घाव पाए गए, जिनमें संक्रमण और दुर्गंध थी
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आपातकालीन उपचार से बची जान, आईसीयू टीम की तत्परता बनी वरदान
चिकित्सकों ने तत्काल अंतःशिरा ग्लूकोज़ देकर रक्त शर्करा नियंत्रित की और सोडियम स्तर को संतुलित किया। गंभीर एनीमिया के उपचार के लिए 2 यूनिट रक्त चढ़ाया गया। साथ ही पुराना और अवरुद्ध फोली कैथेटर बदलकर मूत्र अवरोध दूर किया गया तथा संक्रमण नियंत्रण के लिए प्रभावी एंटीबायोटिक उपचार शुरू किया गया।
इन प्रयासों का सकारात्मक परिणाम सामने आया और अगले ही दिन रोगी पूरी तरह चेतना में आ गया तथा सामान्य रूप से बातचीत करने लगा।
उपचार के साथ गरिमा और आत्मनिर्भरता पर दिया गया विशेष ध्यान
रोगी की स्थिति स्थिर होने के बाद चिकित्सालय की टीम ने उसके समग्र पुनर्वास पर ध्यान केंद्रित किया।
स्वच्छता और देखभाल:
नर्सिंग स्टाफ ने रोगी की व्यक्तिगत स्वच्छता सुनिश्चित की, जिसमें शरीर की सफाई, दंत स्वच्छता और बालों की देखभाल शामिल रही।
घावों का उपचार:
बेडसोर की नियमित ड्रेसिंग की गई और परिजनों को भी घर पर देखभाल का प्रशिक्षण दिया गया।
स्व-देखभाल प्रशिक्षण:
रोगी को स्वच्छ अंतराल स्व-कैथेटरीकरण (CISC) की तकनीक सिखाई गई, जिससे वह घर पर स्वतंत्र रूप से अपनी देखभाल कर सके।
सामाजिक और आर्थिक सशक्तिकरण की दिशा में भी उठाए गए कदम
चिकित्सकीय उपचार के साथ-साथ रोगी की सामाजिक और आर्थिक स्थिति को भी ध्यान में रखा गया।
- बंद दिव्यांग पेंशन को अस्पताल टीम के प्रयास से पुनः शुरू कराया गया।
- रोगी को व्हीलचेयर उपलब्ध कराई गई।
- स्वरोजगार और दिव्यांग अधिकारों की जानकारी दी गई।
- परिवार को काउंसलिंग देकर उनका मनोबल बढ़ाया गया।
- अस्पताल की प्राचार्या ने कही यह महत्वपूर्ण बात

इस अवसर पर प्राचार्या डॉ. संगीता अनेजा ने कहा:-
“अस्पताल का दायित्व केवल रोगी की जान बचाने तक सीमित नहीं है, बल्कि उसे सामाजिक, आर्थिक और मानसिक रूप से सशक्त बनाकर सम्मानजनक जीवन जीने योग्य बनाना भी है।”
मानवीय चिकित्सा का बना प्रेरणादायक उदाहरण
समुचित उपचार, पुनर्वास और सामाजिक सहयोग के बाद अब यह रोगी न केवल चिकित्सकीय रूप से स्वस्थ है, बल्कि आत्मविश्वास और सम्मान के साथ अपने घर लौट रहा है। यह प्रकरण दर्शाता है कि जब चिकित्सा विज्ञान में संवेदनशीलता और समर्पण जुड़ जाता है, तो वह केवल जीवन ही नहीं बचाता, बल्कि जीवन को नई दिशा भी देता है।

