पीलीभीत की बांसुरी उद्योग पर छाने लगा सन्नाटा, घटने लगा टर्नओवर

Share Also

 

पीलीभीत।कभी अपनी मधुर धुनों से देश और विदेश में पहचान बनाने वाली उत्तर प्रदेश की पीलीभीत की बांसुरी अब खुद अपनी पहचान बचाने की जद्दोजहद में है। महज रोजगार का साधन नहीं, बल्कि एक समृद्ध सांस्कृतिक विरासत मानी जाने वाली यह कला अब बिखरने लगी है। “बांसुरी नगरी” के नाम से मशहूर पीलीभीत को उम्मीद थी कि वन डिस्ट्रिक्ट वन प्रोडक्ट (ओडीओपी)’ योजना में शामिल होने के बाद इस पारंपरिक कुटीर उद्योग को नया जीवन मिलेगा, लेकिन पांच साल बीतने के बाद भी हालात सुधारने के बजाय और बिगड़ते जा रहे हैं।

ओडीओपी योजना से नहीं मिला संजीवनी का सहारा :-

प्रदेश सरकार ने वर्ष 2018 में हर जिले के एक विशेष उत्पाद को बढ़ावा देने के लिए एक जिला एक उत्पाद योजना शुरू की थी। पीलीभीत को बांसुरी नगरी के रूप में चुना गया और कारीगरों को 25 लाख रुपये तक ऋण देने की घोषणा हुई। पर हकीकत यह है कि अधिकांश कारीगरों को दो लाख रुपये से अधिक कर्ज नहीं मिल सका। जिस उम्मीद से योजना शुरू हुई थी, वह अब निराशा में बदलती जा रही है।करीब छह माह पहले तक जिले से 50 लाख से अधिक बांसुरियां देशभर में बेची जाती थीं, जो अब घटकर महज दो से ढाई लाख रह गई हैं। कारोबारियों का कहना है कि बांसुरी की बिक्री के लिए कोई ठोस प्लेटफॉर्म न होने से उद्योग अब समाप्ति की ओर बढ़ रहा है।

एक करोड़ का टर्नओवर घटकर रह गया 15-20 लाख

कभी पीलीभीत का बांसुरी कारोबार एक करोड़ रुपये का टर्नओवर रखता था, जो अब घटकर 15-20 लाख रुपये पर सिमट गया है। इस कारोबार की शुरुआत करीब 130 वर्ष पहले नत्था शेख ने की थी। उनके बाद उनके बेटे अब्दुल नबी और फिर उनके बेटे खुर्शीद, नवाब, शमशाद, इरशाद और इकरार अहमद ने इसे आगे बढ़ाया।इनकी फर्म नबी एंड संस’ ने पीलीभीत की बांसुरी को अंतरराष्ट्रीय बाजार में पहचान दिलाई। अहमदाबाद, भोपाल, हैदराबाद, श्रीलंका, अमेरिका, फ्रांस और डेनमार्क तक यहां की बांसुरियां जाती थीं। मशहूर बांसुरी वादक पंडित हरिप्रसाद चौरसिया रोनू मजुमदार और हर्षवर्धन भी पीलीभीत की बांसुरियों के प्रशंसक रहे हैं। एक समय इन बांसुरियों की कीमत 250 रुपये से लेकर 40 हजार रुपये तक होती थी।

बांसुरी कारीगरों की मजबूरी: काम छोड़ा, विरासत टूटी :-

पीलीभीत का मोहल्ला बुजकसावान कभी बांसुरी कारीगरों का गढ़ था, पर अब यहां केवल नाममात्र कारीगर बचे हैं। करीब 150 परिवार यह काम छोड़कर अन्य रोजगार में चले गए हैं। कारीगर हूमायुं बताते हैं कि सरकारी सहायता न मिलने से वे हताश हैं। “दो बार बैंक से कर्ज के लिए आवेदन किया, लेकिन इतने कागजात मांगे गए कि हमें पीछे हटना पड़ा,” वे कहते हैं।अब जो थोड़े-बहुत कारीगर बचे हैं, वे परिवार के साथ मिलकर काम करते हैं। कई बार एक ही समय में कई ऑर्डर लेकर जैसे-तैसे गुजारा करते हैं।

सरकारी प्रयास आधे-अधूरे रह गए:-

तत्कालीन जिलाधिकारी पुलकित खरे ने बांसुरी उद्योग को पुनर्जीवित करने के लिए कई प्रयास किए थे। उन्होंने कारीगरों से मिलकर उनकी समस्याएं सुनीं, स्कूलों में बांसुरी वादन की कक्षाएं शुरू करने की योजना बनाई और नेशनल बैंबू मिशन के तहत पांच हेक्टेयर में 3125 बांस के पौधे भी रोपित करवाए। उद्देश्य था कि बांसुरी बनाने में इस्तेमाल होने वाला बांस स्थानीय स्तर पर ही उपलब्ध हो। परंतु उनके स्थानांतरण के बाद सारी योजनाएं ठंडी पड़ गईं।

ऑनलाइन बिक्री नाम मात्र की, ट्रेड शो में नुकसान:-

बांसुरी कारोबारी इकरार अहमद बताते हैं कि उन्हें बड़े-बड़े ट्रेड शो में बुलाया तो जाता है, लेकिन वहां स्टॉल लगाने के लिए 20 से 70 हजार रुपये तक खर्च करना पड़ता है। “कर्ज लेकर काउंटर लगाएं भी तो बिक्री नाममात्र की होती है,” वे कहते हैं।
ओडीओपी मार्ट पर ऑनलाइन बिक्री की व्यवस्था है, लेकिन उसका कोई खास फायदा नहीं मिला। उनका कहना है कि यदि जल्द कोई ठोस प्लेटफॉर्म नहीं बनाया गया, तो यह कारोबार कुछ ही सालों में ठप हो जाएगा।

विभाग का पक्ष:-

उद्योग विभाग का कहना “ओडीओपी योजना के तहत बांसुरी कारोबारियों को बैंकों से ऋण दिलाया गया है। ऑनलाइन बिक्री के लिए ओडीओपी मार्ट की सुविधा दी गई है। साथ ही, कारोबारियों को विभिन्न ट्रेड शो में भी शामिल कराया जा रहा है।”

निष्कर्षतः

पीलीभीत की बांसुरी, जो कभी संगीत की आत्मा कही जाती थी, अब अपनी ही धुन में खोती जा रही है। यदि समय रहते इसे बचाने के ठोस प्रयास नहीं हुए, तो यह विरासत आने वाली पीढ़ियों के लिए केवल इतिहास के पन्नों में रह जाएगी।


Share Also

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *