रिंटू वर्मा…
पीलीभीत। पीलीभीत मेडिकल कॉलेज के महिला विंग मे जहां एक गर्भवती महिला को टीकाकरण के लिए करीब दो घंटे तक अस्पताल परिसर में भटकना पड़ा, लेकिन अंततः उसे टीका लगाने से साफ मना कर दिया गया।
घंटों लाइन में लगने के बाद भी नहीं मिला टीका
एक मोहल्ला निवासी नीतू पत्नी आशीष सुबह करीब 9 बजे अस्पताल पहुंचीं। उन्होंने पहले एक घंटे तक लाइन में लगकर पर्चा बनवाया। इसके बाद उन्हें कमरा नंबर 19, 21 और 12 में भेजा गया, जहां उन्होंने अपनी बारी का इंतजार किया।
काफी मशक्कत के बाद जब वह टीकाकरण कक्ष में पहुंचीं, तो वहां मौजूद कर्मचारियों ने यह कहकर मना कर दिया कि “पहले यहां इलाज कराओ, तभी टीकाकरण होगा।”
कर्मचारियों के जवाब से हैरान परिजन
स्टाफ के इस रवैये से महिला और उसके परिजन हैरान रह गए। सरकारी अस्पतालों में टीकाकरण एक निःशुल्क और अनिवार्य सेवा मानी जाती है, लेकिन इसके बावजूद महिला को बार-बार अनुरोध करने के बाद भी राहत नहीं मिल सकी।
वह काफी देर तक अस्पताल परिसर में इधर-उधर भटकती रही, लेकिन उसे टीका नहीं लगाया गया।
टीकाकरण केंद्र की कार्यशैली पर सवाल
इस घटना ने मेडिकल कॉलेज के टीकाकरण केंद्र की कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।सूत्रों के अनुसार, यहां तैनात स्टाफ अक्सर गर्भवती महिलाओं और बच्चों को टीकाकरण से मना कर देता है, खासकर तब जब उनका इलाज निजी अस्पतालों में चल रहा होता है।
एएनएम के नाम पर टालने का आरोप
कुछ लोगों ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि स्टाफ मरीजों को यह कहकर लौटा देता है कि “अपने मोहल्ले की एएनएम से टीकाकरण कराओ।”इतना ही नहीं, कई मामलों में परिजनों से एक प्रार्थना पत्र भी लिखवाया जाता है, जिसमें यह लिखवाया जाता है कि मोहल्ले की एएनएम ने टीकाकरण से मना कर दिया है।
गिरता जा रहा टीकाकरण का ग्राफ
कर्मचारियों की इस कार्यशैली का असर अब साफ दिखने लगा है। महिला अस्पताल में टीकाकरण का ग्राफ लगातार गिरता जा रहा है।
गर्भवती महिलाओं और बच्चों के टीकाकरण में कमी आना स्वास्थ्य सेवाओं के लिए गंभीर चिंता का विषय बनता जा रहा है।
उठ रहे बड़े सवाल
* क्या टीकाकरण के लिए अस्पताल में इलाज कराना अनिवार्य है?
* क्या कर्मचारियों को शासन की गाइडलाइन की सही जानकारी नहीं है?
* आखिर गर्भवती महिला को इतनी परेशानी क्यों झेलनी पड़ी?
अधिकारियों से की गई शिकायत
इस पूरे मामले को लेकर पीड़ित गर्भवती महिला ने सीएमओ डॉ. आलोक कुमार और मेडिकल कॉलेज की प्राचार्य से लिखित शिकायत की है। अब देखना यह होगा कि प्रशासन इस मामले में क्या कार्रवाई करता है।
एक ओर सरकार मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य सेवाओं को बेहतर बनाने के लिए लगातार प्रयासरत है, वहीं दूसरी ओर इस तरह की घटनाएं सरकारी व्यवस्था पर सवाल खड़े कर रही हैं। यदि समय रहते सुधार नहीं हुआ, तो इसका सीधा असर आम जनता के स्वास्थ्य पर पड़ सकता है।

