अधिवक्ता अंशुल गौरव सिंह...
पीलीभीत। अपर सिविल जज (जूनियर डिवीजन)/न्यायिक मजिस्ट्रेट, कोर्ट संख्या-3, पीलीभीत ने चेक अनादरण (चेक बाउंस) से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में अभियुक्त जयपाल पुत्र कुंवरसेन, निवासी ग्राम इटौरिया, थाना गजरौला को दोषमुक्त कर दिया। न्यायालय ने अपने फैसले में कहा कि केवल चेक का अनादृत होना किसी व्यक्ति को दोषी ठहराने के लिए पर्याप्त नहीं है, बल्कि वैध देयता और लेन-देन का विश्वसनीय प्रमाण भी आवश्यक है।
एक लाख रुपये के चेक को लेकर दर्ज हुआ था परिवाद
वाद संख्या 6937/2023 में परिवादी संस्था मोटिव माइक्रो बेनिफिट फाउंडेशन ने आरोप लगाया था कि जयपाल ने ऋण की अदायगी के लिए एक लाख रुपये का चेक जारी किया था। बैंक में प्रस्तुत किए जाने पर चेक अनादृत हो गया, जिसके बाद संस्था ने परक्राम्य लिखत अधिनियम की धारा 138 के तहत न्यायालय में परिवाद दाखिल किया।
देयता सिद्ध करने में विफल रहा परिवादी पक्ष
सुनवाई के दौरान न्यायालय ने दोनों पक्षों के साक्ष्यों, दस्तावेजों और तर्कों का विस्तृत परीक्षण किया। न्यायालय ने पाया कि परिवादी पक्ष अभियुक्त के विरुद्ध कथित ऋण देयता तथा अन्य आवश्यक तथ्यों को संदेह से परे सिद्ध नहीं कर सका। उपलब्ध साक्ष्य अभियोजन के दावे को पूरी तरह विश्वसनीय साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं पाए गए।
अभियुक्त के पक्ष में गया संदेह का लाभ
न्यायालय ने अपने निर्णय में यह भी कहा कि अभियुक्त द्वारा उठाए गए संदेहों का परिवादी पक्ष संतोषजनक निराकरण नहीं कर सका। ऐसे में आपराधिक न्यायशास्त्र के सिद्धांतों के अनुसार संदेह का लाभ अभियुक्त को दिया गया और जयपाल को आरोपों से बरी कर दिया गया।
फैसले का कानूनी महत्व
यह निर्णय चेक बाउंस मामलों में एक महत्वपूर्ण नजीर माना जा रहा है। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि धारा 138 एनआई एक्ट के तहत केवल चेक का अनादरण ही पर्याप्त आधार नहीं है, बल्कि शिकायतकर्ता को यह भी विश्वसनीय साक्ष्यों से साबित करना होगा कि चेक किसी वैध और देय ऋण अथवा दायित्व के निर्वहन के लिए जारी किया गया था।

