पीलीभीत।“ख्वाहिशें हैं मुझमें, बुढ़ापा मुझपे इल्जाम है…” — यह पंक्तियां 70 वर्षीय प्रगतिशील किसान मंजीत सिंह संधू पर पूरी तरह फिट बैठती हैं। उम्र भले ही ढलान पर हो, लेकिन जज्बा और जोश आज भी नौजवानों जैसा कायम है। पीलीभीत जिले के मझोला क्षेत्र के गांव बेला पोखरा निवासी मंजीत सिंह अपनी लगन, मेहनत और अनूठे प्रयोगों से न केवल खेती की दिशा बदल रहे हैं, बल्कि प्रकृति के प्रति अपनी संवेदनशील सोच से लोगों को पेड़-पौधों की अहमियत भी समझा रहे हैं।
🌾 नीले, काले और जामुनी रंग के रंग-बिरंगे गेहूं से उगा रहे हैं सेहत की फसल
तराई की उपजाऊ भूमि में जहां आमतौर पर गेहूं, धान और गन्ने की खेती होती है, वहीं मंजीत सिंह संधू ने परंपरागत खेती से आगे बढ़कर आर्गेनिक खेती को अपनाया है। वे पिछले तीन दशक से जैविक खेती कर रहे हैं और अपने खेतों को प्रयोगशाला की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं। इन दिनों उनके खेतों में नीले, काले और जामुनी रंग के गेहूं की बालियां लहराती दिखाई देती हैं।मंजीत सिंह बताते हैं कि यह विशेष किस्म का गेहूं चंडीगढ़ में विकसित हुआ है, जिसका बीज वे पंजाब से लेकर आए थे। शुरुआत में यह गेहूं सामान्य हरे रंग का दिखता है, लेकिन पकने पर इसकी बालियां काले, नीले और जामुनी रंग में बदल जाती हैं। इससे तैयार रोटी गोल्डन कलर की होती है और स्वाद में भी अलग होती है।उनके अनुसार इस गेहूं में नेचुरल एंटी ऑक्सीडेंट की मात्रा अधिक होती है, जो डायबिटीज और अन्य बीमारियों से बचाव में कारगर है। यह गेहूं पौष्टिकता से भरपूर और स्वास्थ्यवर्धक होता है। मंजीत सिंह पिछले तीन साल से इसकी खेती कर रहे हैं और दिल्ली व चंडीगढ़ में डिमांड के अनुसार सप्लाई भी करते हैं। इसके साथ ही उन्होंने हाल ही में मध्यप्रदेश की शरबती गेहूं की भी पैदावार शुरू की है, जो स्वाद में मीठी और दाने में बड़ी होती है।
🌳 दुर्लभ पेड़-पौधों का हरा-भरा संसार
मंजीत सिंह का फार्महाउस किसी नेचर पार्क से कम नहीं। यहां दुर्लभ, औषधीय और एग्जॉटिक पौधों की भरमार है। उनके बगीचे में लिविंग फॉसिल्स, फाइकस कृष्णा, रोज एप्पल, रुद्राक्ष, कपूर, थाई बेर और महागुनी जैसे सैकड़ों पेड़-पौधे हैं, जिनकी अपनी विशिष्ट पहचान है।वे बताते हैं कि लिविंग फॉसिल्स ऐसा पेड़ है जो प्रागैतिहासिक काल से अपने जेनेटिक स्वरूप में बिना बदलाव के जीवित है। वहीं फाइकस कृष्णा पेड़ की पत्तियां दोने जैसी होती हैं, जिनके बारे में मान्यता है कि भगवान श्रीकृष्ण इन्हीं पत्तों पर मक्खन खाया करते थे। रोज एप्पल पेड़ के फल गुलकंद जैसे स्वाद वाले और औषधीय गुणों से भरपूर हैं।मंजीत सिंह कहते हैं कि वे अपने पेड़-पौधों की इंसानों की तरह देखभाल करते हैं। रोज सुबह पौधों को पानी देना, पत्तियों की सफाई करना, और बीमार पौधों पर उपचार करना उनकी दिनचर्या का हिस्सा है। वे कहते हैं—“अगर हमें जीवन बचाना है, तो पहले पेड़-पौधों की रक्षा करनी होगी, क्योंकि यही हमारे अस्तित्व की जड़ हैं।”
🏆 इन्हे मुख्यमंत्री से मिला है सम्मान
प्रकृति के प्रति प्रेम और नवाचारपूर्ण खेती के लिए मंजीत सिंह को मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के हाथों सम्मानित किया जा चुका है। यह सम्मान उनकी वर्षों की मेहनत और पर्यावरण संरक्षण के प्रति समर्पण का प्रमाण है।
🌱 नई पीढ़ी के लिए प्रेरणा
मंजीत सिंह का मानना है कि आजकल किसान पेड़-पौधों से दूरी बना रहे हैं, जबकि असली समृद्धि का रास्ता प्रकृति से जुड़ने में ही है। वे कहते हैं—“कृषि केवल फसल उगाने का काम नहीं, बल्कि धरती मां की सेवा है। जब हम प्रकृति से जुड़ेंगे, तभी हमारी खेती और जीवन दोनों सुरक्षित रहेंगे।”बेला पोखरा गांव के इस 70 वर्षीय बुजुर्ग किसान की कहानी इस बात की मिसाल है कि उम्र केवल संख्या है। अगर दिल में हरियाली के लिए जुनून और सोच में नई दिशा हो, तो बुढ़ापा भी रुकावट नहीं बन सकता।मंजीत सिंह सच में ‘नेचर मैन’ हैं — जो धरती से प्रेम को जीवन का धर्म मानते हैं।

