रिंटू वर्मा…
पीलीभीत। उत्तर प्रदेश के पीलीभीत टाइगर रिजर्व और उसके आसपास का क्षेत्र सिर्फ बाघों के लिए ही नहीं, बल्कि पक्षियों की अद्भुत दुनिया के लिए भी जाना जाने लगा है। यहां की अनुकूल आबोहवा अब दूर-दराज देशों से आने वाले मेहमान परिंदों को भी खूब भा रही है। यही वजह है कि यहां करीब 100 से अधिक प्रवासी पक्षियों की प्रजातियां हर साल प्रवास के लिए पहुंच रही हैं।
बदलते मौसम के साथ पक्षियों की हलचल
सर्दी का मौसम विदा होने और गर्मी की दस्तक के साथ ही शरदकालीन प्रवासी पक्षियों ने अब वतन वापसी शुरू कर दी है। इसी बीच ग्रीष्मकालीन प्रवासी पक्षियों की आमद भी धीरे-धीरे शुरू हो गई है, जिससे जंगल और जलाशयों में एक बार फिर चहचहाहट बढ़ने लगी है।
300 से ज्यादा प्रजातियों का बसेरा
टाइगर रिजर्व के आंकड़ों के अनुसार यहां 300 से अधिक पक्षियों की प्रजातियां पाई जाती हैं। अब न सिर्फ विदेशी बल्कि देश के विभिन्न राज्यों से भी बड़ी संख्या में पक्षी यहां पहुंचने लगे हैं। खास बात यह है कि हर साल प्रवासी पक्षियों की संख्या और विविधता में लगातार इजाफा हो रहा है।
साल में दो बार होती है आमद
टरक्वाइज वाइल्ड लाइफ कंजर्वेशन सोसायटी के अनुसार, यहां 100 से अधिक प्रवासी प्रजातियां साल में दो बार आती हैं—
मानसून के बाद (शरदकालीन प्रवास): नवंबर से आगमन, फरवरी अंत तक वापसी
मानसून से पहले (ग्रीष्मकालीन प्रवास):मार्च-अप्रैल में आमद
इनमें से कई पक्षी सात समंदर पार कर यहां के शारदा सागर डैम और अन्य जलाशयों में प्रवास करते हैं।
ये पक्षी लौटने लगे अपने वतन
* रेड क्रेस्टेड पोचार्ड
* कॉमन पोचार्ड
* ग्रेट क्रेस्टेड पोचार्ड
* मालार्ड
* नार्दर्न पिनटेल
* कॉमन सेंडपाइपर

(फोटो मालार्ड पक्षी )

(फोटो कॉमन सैंडपाइपर पक्षी )
इन पक्षियों का शुरू हो चुका है आना
* स्लेटी लेग क्रेक
* एशियन पैराडाइज फ्लाईकैचर
* लिटिल टर्न
* इंडियन पिट्टा
* गोल्डन ओरियोल
* बी-ईटर
* जैकोबिन कुकू

(फोटो लिटिल टर्न पक्षी )

( फोटो बी ईटर पक्षी )
विदेशों से लेकर हिमालय तक से आते हैं मेहमान
सोसायटी के अध्यक्ष अख्तर मियां खान के अनुसार, ग्रीष्मकालीन प्रवासी पक्षी अफ्रीका और हिमालयी क्षेत्रों समेत देश के विभिन्न हिस्सों से आते हैं। ये पक्षी यहां 3-4 महीने प्रवास कर मार्च-अप्रैल में घोंसले बनाते हैं।
वहीं शरदकालीन प्रवासी पक्षी साइबेरिया, रूस, अलास्का और सेंट्रल एशिया से हजारों किलोमीटर की यात्रा कर यहां पहुंचते हैं।

